नववर्ष की अगवानी के लिए शिकोहाबाद में क्षेत्रीय हास्य कवि सम्मेलन आयोजित हुआ

शब्दम् एवं स्टाफ क्लब हिन्द लैम्प्स के संयुक्त तत्वावधान में नव वर्ष की अगवानी के लिए शिकोहाबाद में क्षेत्रीय हास्य कवि सम्मेलन का आयोजन दिनांक 31 दिसम्बर, 05 की सायं शिकोहाबाद में किया गया।

शब्दम् के सचिव डा. सुबोध दुबे ने संस्था के उद्देश्यॉ व कार्यों पर प्रकाश डाला व आगन्तुक कवियों का परिचय दिया। ओ.पी. खण्डूड़ी ने वर्तमान विसंगतियों भरे परिवेश में हास्य की आवष्यकता बताते हुये कवियों का स्वागत किया। कार्यक्रम का शुभारम्भ कवयित्री चेतना शर्मा (आगरा) की सरस्वती वंदना से हुआ। कवि सम्मेलन में हास्य व्यंग्य के क्रम का प्रारम्भ मैनपुरी के जयेन्द्र पाण्डेय 'लल्ला' ने निम्न पंक्तियों से किया।

मत भेजो मुझे ऐसी शुभकामनायें
जो मेरे किसी काम न आयें।

नव वर्ष के प्रसंग को अपनी कविता के माध्यम से मुकेश मणिकांचन ने और आगे बढ़ाया-''हम विसंगतियों से हारे आप चाहे जीत जायें। अब तो मुश्किल है बहुत नववर्ष की शुभकामनायें'' महुआ (राज.) से पधारे व्यंग्यकार सुरेन्द्र सार्थक की हास्य व्यंग्य रचनायें आग्रह पूर्वक सुनीं गईं ''बुलाना चाहता हूं प्यार पर पीड़ा चली आती''। राजस्थान के ही गंगापुर सिटी से आये डा. गोपीनाथ चर्चित ने सभी को हंसा-हंसा कर लोट-पोट कर दिया ''अध्यापक ने छात्र से पूछा- कश्मीर भारत का स्वर्ग कैसे है बताओ। छात्र बोला - ये तो आप वहीं जाकर जान पाओगे। जब वहां जाते ही स्वर्गवासी हो जाओगे।''

लखनऊ से पधारे श्यामल मजूमदार ने भी सशक्त रचनायें सुनाकर सभी को प्रभावित किया ''एक माटी का दिया सारी रात अंधियारे से लड़ता है, तू तो खुदा का दिया है किस बात से डरता है।'' नगर के सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार प्रशान्त उपाध्याय के समसामयिक व्यंग्यों को उपस्थित श्रोताओं ने प्यार के साथ सुना ''इस जिन्दगी के महाभारत में जब से चोरी, डकैती, बेईमानी, भ्रष्टाचार, आतंकवाद व हत्याओं ने जगह पाली है। इन मक्कारों ने अदालत में कसम खा-खाकर मेरी गीता भी बदनाम कर डाली है।''

हास्य के वरिष्ठ कवि पदम अलबेला (हाथरस) ने भी श्रोताओं की तालियाँ बटोरीं ''आप हंसते हैं लेकिन मेरा ख्याल है। आपके भी घरों का यही हाल हौ'' कार्यक्रम का ठहाकों पूर्वक संचालन कर रहे लटूरी लट्ठ ने उपस्थित जन समुदाय को देर तक गुदगुदाया -

''हमारे सिर तो उस दिन, शर्म से झुक जाते हैं। जब डोनेशन के नाम पर हम शिक्षा के मन्दिरों में लुट जाते हैं।''

हास्य कवि सम्मेलन में पढ़ी गयी कविताओं के कुछ अंश:-
जयेन्द्र पाण्डेय 'लल्ला' पढ़ी गयी रचना का अंश:-

जो लोग सोचते हैं, वे जब कभी कुछ ज्यादा सोच लेते हैं।
तो अपने सिर का एक बाल नोच लेते हैं।
और यही उनकी चिन्ता का निवारण होता है।
मेरी समझ में, चिंतकों के गंजे होने का यही कारण होता है।

प्रशान्त उपाध्याय द्वारा प्रस्तुत रचना का अंश :-
'बहिन जी' शब्द सुनकर वो तैश में आ गई।
बोली - ये तुम्हें क्या हो गया है आज।
तुम्हारा दिमाग है कि बहुजन समाज।

श्यामल मजूमदार द्वारा पढ़ी गयी रचना के अंश:-
सभ्यता की कोख में असभ्यता है पल रही,
पश्चिमी बयार में है आस्थाएं जल रहीं
पर हमारी संस्कृति नहीं कोई छुई-मुई
मिटेगी स्याह कालिमा, जो रूप धर के छल रही।

श्रीमती चेतना शर्मा द्वारा प्रस्तुत रचना का अंश :-
बिकतीं हैं मूर्तियाँ पर भगवान नहीं बिकता।
बाजार में कहीं भी सम्मान नहीं बिकता।
बिकते हैं आदमी ही और देश बिक रहे हैं।
जीवन में एक सच्चा इन्सान नहीं बिकता।

श्री लटूरी लट्ठ द्वारा प्रस्तुत रचना का अंश :-
सम्बन्धों के ऑंगन मितवा दिल से दिल की दूरी है।
पेट की खातिर पग-पग लड़ना हम सब की मजबूरी है।
रोना धोना छोड़ साथिया मुस्कानों के गाँव चलें,
जीना है तो सच कहता हूँ हँसना बहुत जरूरी है।

श्रो ताओं को गुदगुदाते श्री लटूरी लट्ठ।

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