कबीर जैसे दोहे अब भी जरूरी - जगत प्रकाश
हिन्दी दोहा: प्रादुर्भाव-वर्तमान एवं सम्भावनायें पर हुई कार्यशाला

कोई भी विधा तब तक स्वीकार नहीं की जाएगी जब तक उसमें तरलता न हो। दोहे की भाषा खड़ी बोली बेशक हो लेकिन उसमें खुरदरापन न हो, विचार भी तरलता लिए हों, तो बात हृदय के अन्दर तक पहुंचेगी। ये विचार प्रख्यात कवि, साहित्यकार व उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान के उपाध्यक्ष सोम ठाकुर ने व्यक्त किए। वे यहाँ उ.प्र. हिन्दी संस्थान के सहयोग से शब्दम् द्वारा आयोजित ''हिन्दी दोहा : प्रादुर्भाव, वर्तमान एवं सम्भावनायें'' विषय पर हुई कार्यशाला की अध्यक्षता कर रहे थे।

श्री सोम ठाकुर ने कहा कि खड़ी बोली में लिखे गए दोहों को लोकमंच की शैलियों ने बरकरार रखा है। इसमें पहलेबात कह दी जाती है फिर उदाहरण देते हैं। उन्होंने भारत और पाके के रिश्ते के सम्बन्ध में एक दोहा सुनाकर नए का उदाहरण प्रस्तुत किया। ''...तू पत्थर की एठ है मैं पानी की लोच, तेरी अपनी सोच है मेरी अपनी सोच....''

दोहा सम्राट कैलाश गौतम ने कहा बड़े कथानक को एक दोहे के रूप में प्रस्तुत कर देना बड़ी बात है। यह दो पंक्तियों का छंद है। संयोग के क्षण को दोहा कहा गया है। संयोग का दोहे से लगाव है।

कवि जगत प्रकाश चतुर्वेदी ने कहा कि भाषाओं का आदिम छंद है दोहा। उन्होंने कहा कि कालिदास में भी ये मिलता है। विक्रम और उर्वशी के मध्य का जो कथानक है उसमें भी दोहे हैं। श्री चतुर्वेदी ने कहा कि आज कबीर जैसे दोहों की आवश्यकता है। इससे समाज में आत्मीयता आएगी। उन्होंने कहा इसका भविष्य उज्जवल है। यह फिर से स्थापित हुआ है। जिस दृढ़ता से मजबूत हुआ था उतना ही सशक्त है। कवि सूर्य कुमार पाण्डेय ने कहा कि दोहा अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। तुलसीदास ने रामचरितमानस में दोहे का प्रचुरता से प्रयोग किया है।

कवि हरिराम द्विवेदी ने कहा कि दोहो में पूरी कथा समा जाती है। उन्होंने कहा कि आगे की पीढ़ी के लिए दोहा धरोहर के रूप में हमेशा रहेगा। डा. चन्द्रवीर जैन ने कहा कि दोहे के 23 भेद बताए गए हैं। इसको लेकर प्रयोग हर युग में होते रहे हैं।

शब्दम् की अध्यक्ष किरण बजाज ने दोहा कार्यशाला के लिए आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम संयोजक व शब्दम् के सचिव डा. सुबोध दुबे ने कहा कि दोहा अपनी तीखी भाव व्यंजना के लिए जाना जाता है।

विचार गोष्ठी में मंचासीन (बायें से) श्री सूर्यकुमार पाण्डेय, श्री हरिराम द्विवेदी, श्री पी.के. मिश्र (निदेशक, उ.प्र. हिन्दी संस्थान), श्री सोम ठाकुर, श्रीमती किरण बजाज, श्री जगत प्रकाश चतुर्वेदी एवं श्री कैलाश गौतम।
श्री कैलाश गौतम का तिलकाभिशेक करते मन्दिर के पुजारी जी, साथ में हैं श्रीमती किरण बजाज।

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